“धर्म नहीं दूरी – बागेश्वर धाम की पदयात्रा में हिंदू-मुस्लिम साथ-साथ!”

अजमल शाह
अजमल शाह

भारत की एकता और अखंडता का प्रतीक बन चुकी बागेश्वर धाम सरकार की पदयात्रा इन दिनों पूरे देश में चर्चा का विषय बनी हुई है। पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के नेतृत्व में चल रही यह दिल्ली से वृंदावन तक की विशाल यात्रा न सिर्फ धार्मिक भावना को जोड़ रही है, बल्कि सामाजिक सौहार्द की नई मिसाल भी पेश कर रही है।

देशभर से हजारों श्रद्धालु इस यात्रा में शामिल हो रहे हैं — और खास बात यह है कि इस बार सिर्फ सनातन धर्मावलंबी ही नहीं, बल्कि मुस्लिम समाज के लोग भी इस यात्रा में कदम से कदम मिला रहे हैं।

मुजफ्फरनगर से उठे कदम, भाईचारे की राह पर निकले मुसलमान

उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर, सहारनपुर और शामली जिलों से रविवार को एक अनोखा नज़ारा देखने को मिला।
सैकड़ों पसमांदा मुस्लिम समाज के लोग गाड़ियों के काफिले के साथ दिल्ली के लिए रवाना हुए ताकि वे वृंदावन की ओर जा रही इस यात्रा में शामिल हो सकें।
इन लोगों ने लगभग 8 किलोमीटर पैदल चलकर यह संदेश दिया — “हम सब एक हैं, और भारत सबका है।”

हिंदुस्तानी पसमांदा मंच का समर्थन – “यह यात्रा दिलों को जोड़ रही है”

हिंदुस्तानी पसमांदा मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष मोहम्मद शमशाद मीर ने बताया कि संगठन के उपाध्यक्ष शाहनवाज मलिक के नेतृत्व में यह दल दिल्ली रवाना हुआ।
उन्होंने कहा, “बाबा धीरेंद्र शास्त्री जी ने पसमांदा समाज को जो निमंत्रण दिया, वह हमारे लिए सम्मान की बात है। हम इस यात्रा में शामिल होकर भारत की एकता और अखंडता को मजबूत करने का संकल्प लेते हैं।”

संदेश साफ है – ‘भारत साथ था, है और रहेगा’

इस पदयात्रा ने साफ कर दिया कि धर्म से बड़ा देश है और आस्था से बड़ी इंसानियत। जब बागेश्वर धाम की पदयात्रा में अल्लाह-ओ-अकबर और जय श्रीराम दोनों की आवाजें साथ गूंजती हैं, तो यही भारत की असली पहचान बनती है।

कभी टीवी डिबेट्स पर “धर्म” की दीवारें खड़ी करने वाले लोग शायद यह नज़ारा देखकर चाय ठंडी छोड़ देंगे क्योंकि यहां “ट्रेंडिंग टॉपिक” नहीं, बल्कि “ट्रू यूनिटी” चल रही है।
एकता का GPS ऑन है — और मंज़िल है वृंदावन, लेकिन रास्ता जाता है दिलों तक!

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